Thursday, 10 June 2010

गंगा स्नान


जब जान लोगे
मेरे भेद सारे
मुझसे मिटा लेना
तुम खेद सारे

और फिर से मिलना
पुराने प्रणय से
वापस पुराने पुराने
समय से

निशाधीश मेरे
फिर से तुम आना
निश्शेष बातों में
निस्वन जगाना



मेरी धारणाएं बदल सी गयी हैं
पुरानी शिलाएं पिघल सी गयी हैं

जिनपे मेरी तुम्हारी परस्पर
राहें थीं पढ़ती, मीलों के पत्थर

अब राह लम्बी है, और हैं दिशाएँ
देवल कई हैं, कई आस्थाएँ

मैं टेक लेती हूँ माथा सभी को
और भूल जाती हूँ थोड़ी विथाएं

निशाधीश फिरभी...अगर हो सके तो
भरी दोपहर में, निशा लेके आना
बहुत थक गए होगे तुमभी
निकेतन...
बेघर सी अपनी दशा लेके आना

दोनों चलेंगे गंगा नहाने
पापों दुखों को नदी में बहाने

बदले समय में क्या सच क्या मिथ्या?
वही तुम पुजारी, वही मैं भी सत्या

तस्वीर इन्टरनेट से ली गयी है.

परस्पर खेद

अपने भेद मैं तुमको
दे भी दूँ तो, मेरे पास हैं वो

ऐसी कोई बात बताओ
जिस्से तुम ले जाओ
मेरा लेखा संस्मरण का
और वो सारे पाँव

जो कि अपने चिन्ह बनाते
वापस मुझ तक आते हैं
मैं बार बार मिटाता हूँ
वो परिचय से बन जाते हैं

मैं इनसे डरता हूँ
इनमे पता लिखा है मेरा
मेरे गिर्द बनाते हैं ये
पहचानों का घेरा

जिसमें मेरी चादर के
इतने टुकड़े हो जाते हैं
मैं अपने नाम को ढकता हूँ
वो तन भी नहीं छुपाते हैं

मैं नग्न खड़ा चौराहे पे
शर्माता हूँ, घबराता हूँ
अपने रंग बिरंगे कपड़ों
से मैं बाहर आता हूँ

और प्रश्नों की काली परतें
मेरा बदन छुपाती हैं
मैं उत्तर के सादे वस्त्र
चोरी करके लाता हूँ

और पंजी में क़ैदी सा
हो जाता है नामांकन
मैं नंबर बन के जीता हूँ
जोड़ घटाओ का जीवन

अपने भेद मैं तुमको दे भी दूँ तो
मेरे पास हैं वो
ह्रदय बांटना ह्रदय ह्रदय से
सोचता हूँ...अनायास है क्यों?

तस्वीर इन्टरनेट से ली गयी है.

मैं और मेरा साया


मैं अपने साये का पीछा
करता हूँ, पर डरता हूँ
वो मेरी छोटी सी बात
को समझे ना समझे

मेरे पैरों से उलझा
वो मुझसे उलझन खोले
मैं उससे उलझूं,
फिर कोई,
मुझसे उलझे न उलझे

वो अपनी बाहें फलाये
कहता के मैं छल हूँ
आओ मुझमें मिल जाओ
मैं बस पल दो पल हूँ

लेकिन मेरे अलिंगन में
वो इतना खो जाए
अपनी खोज में मुझसे आगे
धीरे से बढ़ जाए

मैं इस पर अपने साए से
लड़ता हूँ, पर डरता हूँ
वो मेरी छोटी सी बात
को समझे न समझे...

(स्वरचित तस्वीर)

दो पल के अवकाश


आज कहीं मत जाओ
आज बैठे रहो सकाश
या मुझको वापस कर दो मेरे
दो पल के अवकाश

और नहीं कुछ था मेरा
बस थोड़े से काश
और थोड़ा आकाश

बहुत विमुख था, यौवन मेरे सम्मुख
लेकिन मेरा था
मैं जिसमें टहला करता था
बहुत बड़ा वो घेरा था




मेरी सीमा छोटी कर दो
अपने छोटे घेरे में
या सारे घेरे ले जाओ
ले लो मेरा पाश

मेरे नयन जलाशय में
बिंब जगत के आते हैं
चलचित्रों से जीवन के
सब साये मंडलाते हैं

निमिश नयन मैं कभी कभी
उनको देखा करता हूँ
भगदड़ करते महानगर
जब आँखों में बस जाते हैं

दर्पन में मैं कभी कभी
भीड़ के जैसा दिखता हूँ
सपने मोल कराने को
कितने हाथों बिकता हूँ

मेरे चुप साननाटों में
जाने किनकी बातें हैं?
निर्जन कहीं नहीं रहता
जाने किनके नाते हैं?

बोझिल मन मैं अब भी अपने
गाँव देखा करता हूँ
ख़ालीपन के तर्क वितर्क
कंकड़ सा फेंका करता हूँ

हिलते पानी में थोड़ा
हिलता हूँ, अच्छा लगता है
छोटी छोटी लहरों से
मिलता हूँ, अच्छा लगता है

कृपण मैं अपने पल छिंनों को
पन्नों में संजोता हूँ
अगली भोर मैं निश्दिन लेकिन
पिछली संध्या खोता हूँ

सारी जनता ले जाओ
करदो सबको निराश
पर मुझको वापस करदो मेरे
दो पल के अवकाश

या आज कहीं मत जाओ
आज बैठे रहो सकाश ...

तस्वीर इन्टरनेट से ली गयी है.